
आगमन
नवंबर की ठंडी शाम थी। बस पहाड़ी रास्तों से होती हुई धीमे-धीमे ऊपर चढ़ रही थी। खिड़की के पार धुंध ऐसे फैल रही थी जैसे आसमान ने अपनी सफ़ेद चादर धरती पर बिछा दी हो।
सीट नंबर 12 पर बैठी आन्या ने अपना शॉल कस कर ओढ़ा। दिल्ली की भीड़-भाड़ और कॉर्पोरेट नौकरी से थक चुकी थी। उसने सोचा था कि कुछ दिनों के लिए मनाली में अकेले रहकर खुद को फिर से पहचान पाएगी। बस रुकी – “मनाली बस स्टैंड।”
ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। उसके चेहरे पर मुस्कान आई — “बस कुछ दिन… सिर्फ़ मैं, पहाड़ और सुकून।” लेकिन उसे क्या पता था कि इन पहाड़ों की खामोशी में एक ऐसा रहस्य छिपा है, जो उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।
वह अजनबी
आन्या एक छोटी-सी होमस्टे में रुकी -“हिमालय व्यू कॉटेज”।
मालकिन, मिसेज़ शर्मा, स्नेहभरी महिला थीं। आप अकेली हैं बिटिया?
“जी, कुछ दिन शांति चाहिए थी।”
“यहाँ शांति तो है… बस कभी-कभी रात का कोहरा डराता है,” उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, लेकिन उनकी आँखों में हल्का भय झलक रहा था।
अगले दिन सुबह, आन्या झरने की ओर टहलने गई। वहाँ उसकी मुलाक़ात हुई आरव से।
काले जैकेट में, कैमरा हाथ में लिए, वह पहाड़ों की तस्वीरें खींच रहा था।
आप प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं? आन्या ने पूछा। बस दिल का फोटोग्राफर हूँ, आरव मुस्कराया।
वह मुस्कान कुछ अजीब थी — गहरी, रहस्यमय।
दोनों ने साथ चलना शुरू किया। कोहरे के बीच, झरने की आवाज़ और ठंडी हवा — सब कुछ मानो किसी फिल्म का दृश्य हो।
आरव ने उसे झरने के किनारे पुरानी लकड़ी की बेंच दिखाई।
“यहाँ लोग कहते हैं, कभी एक लड़की गायब हो गई थी,” उसने धीरे से कहा
“क्या?”
हाँ, तीन साल पहले। पुलिस ने कहा कि वह फिसलकर गिर गई, पर उसका शरीर कभी नहीं मिला। आन्या सिहर गई। लेकिन आरव की नज़रों में कुछ ऐसा था, जो उसे डर के बावजूद अपनी ओर खींच रहा था।
कोहरे की रात
तीसरी रात। बाहर तेज़ हवा और बारिश थी।
आन्या किताब पढ़ रही थी कि तभी खिड़की पर दस्तक हुई। उसने झाँका — आरव था, पूरी तरह भीगा हुआ।
“माफ़ कीजिए, मेरी बाइक फँस गई है। यहाँ थोड़ी देर रुक सकता हूँ?”
आन्या ने दरवाज़ा खोला। आग के पास दोनों बैठे, चाय पी।
“तुम डरती नहीं?” आरव ने पूछा।
“किससे?
“पहाड़ों से। कोहरे से। या मुझसे?”
उसकी आँखों में चमक थी।
“शायद अब किसी चीज़ से नहीं,” आन्या ने कहा, और पहली बार मुस्कराई।
बिजली चली गई। अंधेरा छा गया। सिर्फ़ आग की लपटें कमरे में झिलमिला रहीं थीं।
एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।
वो पल कुछ कह गया – अनकहा, लेकिन गहरा
रहस्य खुलने लगा
अगले दिन मिसेज़ शर्मा ने कहा — “कल रात किसी ने पहाड़ी की ओर जाता रास्ता खोला था। तू तो नहीं गई थी ना बिटिया? नहीं,” आन्या ने चौंककर कहा।
“अजीब बात है, वही रास्ता जहाँ से तीन साल पहले वह लड़की गायब हुई थी।”
रात को आन्या को नींद नहीं आई। खिड़की से देखा — आरव पहाड़ की ओर जा रहा था, टॉर्च लिए।
वह उसके पीछे गई। कोहरे में उसके कदमों की आहट खो गई। तभी उसे एक पुराना घर दिखाई दिया – टूटा-फूटा, बंद दरवाज़ा, और दीवार पर उकेरा गया नाम: “रितिका”
आन्या का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। यही तो वह लड़की थी जिसके बारे में आरव ने बताया था।
पुराना घर
वह धीरे-धीरे भीतर गई। पुरानी लकड़ी की मेज़ पर एक फ़ोटो पड़ी थी – रितिका और आरव
तुम यहाँ क्या कर रही हो?” अचानक पीछे से आवाज़ आई। वह मुड़ी – आरव खड़ा था, चेहरा गंभीर। “रितिका कौन थी?
“मेरी मंगेतर,” आरव ने ठंडे स्वर में कहा। “वह इस पहाड़ से गायब हुई थी। सबने कहा मैं दोषी हूँ। लेकिन मैंने उसे मारा नहीं।”
“तो तुम क्या ढूँढ़ रहे हो?” “सच।”
उसकी आँखों में दर्द और जुनून मिला हुआ था।
आन्या ने महसूस किया, वह झूठ नहीं बोल रहा – या शायद बहुत सच्चाई से झूठ बोल रहा था।
अगले कुछ दिनों में, गाँव में अजीब घटनाएँ होने लगीं।
किसी ने रात को मिसेज़ शर्मा के घर के बाहर दीवार पर लिखा – “वह लौट आई है।”
कोहरा और घना हो गया। एक रात, आन्या को अपने कमरे में रितिका की आवाज़ सुनाई दी —
“सावधान रहो, आरव झूठ बोल रहा है…”
वह चीख पड़ी। जब उसने दरवाज़ा खोला, तो आरव सामने था।
“क्या हुआ?”
“यहाँ कोई था मैंने उसकी आवाज़ सुनी”
“तुम्हारा वहम है।”
लेकिन अगले दिन, उसने आरव के बैग में वही पेंडेंट देखा जो रितिका की फ़ोटो में था।
अब डर ने जगह ले ली थी।
सच्चाई की परतें
आन्या ने मिसेज़ शर्मा से सब बताया।
वे बोलीं – “बिटिया, रितिका मेरी भतीजी थी। मैं जानती हूँ कि आरव से उसका झगड़ा हुआ था। उसी रात वो गायब हो गई। पुलिस ने केस बंद कर दिया।”
आन्या ने तय किया कि वह सच्चाई सामने लाएगी।
वह अकेले उस पुराने घर गई। वहाँ फर्श पर एक छोटा सा ताबूत जैसा बक्सा पड़ा था। उसने खोला – उसमें एक कैमरा था।
उसमें एक वीडियो थी – रितिका, आरव से झगड़ रही थी।
आरव चिल्लाया – “तुम किसी और के साथ थी!”
रितिका ने कहा – “तुम पागल हो गए हो, आरव!”
और कैमरा गिर गया। बस वही आख़िरी दृश्य था।
सामना
रात को आन्या ने आरव को बुलाया।
“यह क्या है?” उसने वीडियो दिखाया।
आरव ने सिर झुका लिया – “मैंने कुछ नहीं किया। वह खुद भाग गई थी।”
“लेकिन अगर वो भागी थी तो वापस क्यों नहीं आई?”
“क्योंकि वह मर चुकी है,” आरव ने ठंडे स्वर में कहा। आन्या पीछे हटी। “तुमने मारा उसे?”
“नहीं!” वह चिल्लाया। “मैंने सिर्फ़ उसे बचाने की कोशिश की थी। वह पहाड़ी से फिसल गई थी।”
आन्या ने देखा – उसकी आँखों में आँसू थे, पर साथ ही कोई अँधेरा भी।
तभी बाहर किसी के कदमों की आहट आई।
दरवाज़ा खुला – मिसेज़ शर्मा खड़ी थीं।
“सच मैं बताऊँगी,” उन्होंने कहा।
“रितिका की मौत एक हादसा नहीं थी। मैंने ही उसे धक्का दिया था। वह आरव को छोड़ किसी और से शादी करने वाली थी। मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसने हमारे परिवार की इज़्ज़त मिटा दी।”
आरव ने चिल्लाया – “क्या कहा आपने!”
लेकिन तभी मिसेज़ शर्मा ने दरवाज़े की तरफ़ दौड़ लगाई। बाहर अंधेरा और कोहरा था।
एक चीख गूँजी – और सब ख़ामोश हो गया।
अंत
अगले दिन पुलिस आई।
रितिका का शव पुराने झरने के पास मिला। मिसेज़ शर्मा का भी – पहाड़ी से गिरी हुई
मामला बंद हुआ – “हत्या और आत्महत्या” के रूप में।
आरव ने मनाली छोड़ दिया।
आन्या वापस दिल्ली लौट आई — लेकिन दिल में एक अजीब खालीपन लिए।
कुछ महीनों बाद, एक प्रदर्शनी में उसने आरव की फोटो देखी – झरने की, और उस पर लिखा था:
“कभी-कभी कोहरा सच्चाई नहीं छिपाता, बल्कि हमें खुद से मिलवाता है।”
उसकी आँखें भीग गईं। शायद कुछ रिश्ते पूरे नहीं होते – पर अधूरे ही सबसे ज़्यादा गहरे होते हैं।